मानव की यात्रा (चार)
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पुराकाल में
बुझती न थी यह
आग कभी भी।
आदिमानव
करता था उसकी
नित्य सुरक्षा।
कभी-कभी तो
बनती कारण वह
अग्निकांड का।
जल जाते थे
जंगल के जंगल
इस आग से।
वर्षा होती तो
वह जमीन तब
होती उर्वर।
उगते वहाँ
नए-नए पादप
कंद-मूल के।
समझ गया
तब आदिमानव
है यह आहार।
@दिनेश कुकरेती

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